Wednesday, June 3, 2015

शब्द

कई मरतबा इन लम्हों को जी कर के आज ये मामूली लगते है. मामूली है तो क्या हुआ तजुर्बे की कमी नहीं है इनमें। खैर  शब्द हमेशा से ही ज़िंदगी  का स्रोत  रहे  है मेरे लिए। जो मुझे जिंदगी जीने की नयी उम्मीद देते है.

कुछ बड़े ही माहिर होते है इस कला की. आज कई चीजें सुनी मैंने बहुत कुछ समझा मैंने बहुत कुछ सीखा भी।
कुछ समेटना चाहता हु इन लम्हों से और  चाहता हु अपने आप मैं इस तरह से समां लू की लगे नहीं की मुझ से जुदा थे। 

 इक्षाएं , मनुष्य के अंदर फिट ऐसा पुर्जा है जी कभी  बंद नहीं हो सकता है. भले ही ज़िन्दगी की मशीन बंद होने वाली भी हो फिर भी इक्षाएं नहीं मरती। शायद  इसलिय हम सब को मोक्ष चाहिए।

लेकिन क्या इक्षाए बुरी है ? हमें सारी इक्षाओं को मार के जीना सही तरीका है. लेकिन हर उस हथियार की तरह जिसके दो पहलू होते है या तो मार लो या कुछ खाने को फल काट लो।  इक्षाएं भी उसी हथियार की तरह है.
करना क्या चाहते हो अपनी इक्षाओ को ले कर.